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डॉ भीमराव अम्बेडकर का सन्देश: व्यवसायी बने, आत्मनिर्भर बनें

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डॉ भीमराव अम्बेडकर का सन्देश: व्यवसायी बने, आत्मनिर्भर बनें

Post  nikhil_sablania on Thu Oct 16, 2014 8:29 pm

डॉ अम्बेडकर के कहा था कि मेरी दिलाई सुविधाएं आज हैं पर कल नहीं होंगी इसलिए स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर बनने की जरुरत है।

जब विदेश में डॉ अम्बेडकर अपनी पी एच डी की थीसिस लिख रहे थे तो उनके दिमाग में शायद भारत का वह शोषित और पिछड़ा समाज रहा होगा जो निर्धनता के कारण निम्नन साधनों से भी वंचित था। बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने अपनी रिसर्च का विषय चुना 'भारत में रुपये की समस्या :इसका उद्भव और समाधान' और अपनी उस रिसर्च में भारत की मुद्रा (करेंसी) रूपये के विषय के साथ-साथ अर्थव्यवस्था और वाणिज्य पर भी बहुत गहराई से अध्यन्न करके उसे लेखनी के माध्यम से आनेवाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित किया। अपने इस कार्य से बाबा साहिब आनेवाली पीढ़ियों को यह सन्देश देना चाहते थे कि उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा वाणिज्य एवं मुद्रा ज्ञान का संग्रह करके स्वयं का आर्थिक विकास करना है जिससे कि वह अपना शोषण समाप्त कर सके।

परन्तु यह बहुत दुखद बात है कि डॉ अम्बेडकर की इस हिदायत के देने के बावजूद, कि आज मेरे दिलाई सुविधाएं हैं पर कल नहीं होंगी, लोगों ने बाबा साहिब की इस बात को नजर अंदाज कर दिया। लोग भूल गए कि डॉ अम्बेडकर शोषित और पिछड़े समाज को नौकरी लेनेवाला नहीं बल्कि नौकरी देनेवाला बनाना चाहते थे। डॉ अम्बेडकर शुरू से ही चाहते थे कि गरीब, शोषित और पिछड़ा तबका व्यवसायी बने। भारत में ऐसे बहुत से सम्प्रदाय हैं जो अधिका-अधिक व्यवसायों से जुड़े हैं और अपनी आर्थिक शक्ति के होने के कारण, अपनी बहुत कम जनसंख्या होते हुए भी, अपनी आर्थिक शक्ति से एक मजबूत समाज है।

असल में किसी भी देश का समाज तब एक मजबूत समाज बनता है जब वहाँ अधिाक-से-अधिक लोग व्यवसायी हों और कम-से-काम लोग वेतन भोगी हों। व्यवसाय वह कुंजी है जिसके माध्यम से मनुष्य अधिका-अधिक लोगों से जुड़ता है और उसके जुड़ने का माध्यम 'मुद्रा' और वह 'समान' या 'सेवा' होते हैं जिन्हे वह लोगों तक पहुंचता या पहुंचाती है। तो जितने अधिक लोगों से एक व्यवसायी जुड़ती या जुड़ता है उतना ही वह उनको समझता (समझती) है और उनको समझ कर जब वह अपना सामान या सेवा देता (देती) है तो उतनी ही मुद्रा बढ़ती है। इससे न सिर्फ व्यवसायी आर्थिक रूप से मजबूत बनता है बल्कि मानव का विकास भी होता है और सामान और सेवाओं को और अधिक विकसित (बेहतर) बनाने हेतु, वैज्ञानिकी और कला का विकास भी होता है।

क्या डॉ अम्बेडकर का सन्देश केवल पिछड़े और शोषित समाज के लिए है? जी नहीं, ऐसे कतई भी नहीं है कि उनका सन्देश केवल कुछ वर्गों के लिए है। परन्तु हाँ यह बात जरूर है कि जितनी जरूररत पिछड़े और शोषित समाज को वाणिज्य और मुद्रा के ज्ञान की जानकारी की जरुरत है उतनी भारत में विकसित समूहों को नहीं है। जहाँ तक भारत से बाहर और विकसित देशों की बात है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति वाणिज्य और मुद्रा की शिक्षा लेता है, उन देशों में ऐतिहासिक तौर पर जातिवादी जैसी कोई सामाजिक बुराई नहीं रही जिसकी वजह से केवल दो-चार समूहों को छोड़ कर शेष लोग शिक्षा और व्यवसायों से वंचित रहे हों। इसलिए वहाँ यह शिक्षा वर्षों से सबको मिलती आ रही है और सब ही लगभग शिक्षित है सो इस शिक्षा को आगे बढ़ा रहे है है और ज्यादा से ज्यादा इसकी गहराईयों में जा रहे हैं। परन्तु भारत में इसलिए यह शिक्षा आवश्यक हो जाती है की एक तो यहाँ एक बड़ा वंचित समाज है जो हर तरह से पिछड़ा और शोषण का शिकार है और दूसरा यह कि विकसित तबके की भी निरंतर जनसंख्या बढ़ने के कारण उसमें भी वंचित लोगों की संख्या बढ़ गई है सो उन्हें भी इस शिक्षा की बहुत जरुरत है। इसलिए भारत में वाणिज्य और मुद्रा की उस शिक्षा की बहुत आवश्यकता है जो कि हमें एक सफल व्यवसायी या निवेशक बना सके।

मैंने इस कार्य को करने का जिम्मा अपने ऊपर लिया है। मैंने प्रण लिया है कि मैं जिस प्रकार सामाजिक अन्याय के खिलाफ डॉ अम्बेडकर की मुहीम को पिछले चार सालों से आगे बढ़ा रहा हूँ, उसी मुहीम को आगे बढ़ाते हुए अब मैं डॉ अम्बेडकर के उस विचार को भी आगे बढ़ाना चाहता हूँ जो उनके मस्तिक्ष में अपनी पी एच डी की थीसिस लिखते समय थे। मैंने चाहता हूँ कि हिंदी बोलनेवाली हमारी जनसंख्या, चाहे वह किसी भी जाती या धर्म से हो, जो भी आर्थिक रूप से कमजोर हैं मैं उन्हें वाणिज्य और मुद्रा की शिक्षा दे कर मजबूत बनाऊं। पिछले ढाई वर्षों से मैं इंटरनेट के माध्यम से यह शिक्षा ले रहा हूँ और अपने व्यवसाय को आगे बढ़ा कर आर्थिक रूप से स्वतन्त्र व सशक्त हो रहा हूँ और मैं यह इसलिए कर पाया कि मेरी इंग्लिश भाषा पर पकड़ अच्छी थी। परन्तु मैं जनता हूँ कि हमारे भारत में, और खासकर हिन्दीभाषी क्षेत्र में और उसमें भी दलित, पिछड़े और आदिवासी और अन्य गरीब लोगों में इंग्लिश की पकड़ उतनी नहीं है। सो इसके लिए मैंने हिंदी में वाणिज्य और मुद्रा की वह पुस्तकें उपलब्ध कराने का निश्चय किया है जिन्हें मैं पढ़ चुका हूँ और उनसे शिक्षा प्राप्त करके एक सफल व्यवसायी बन चुका हूँ। अब मैं चाहता हूँ कि आप भी उस शिक्षा का लाभ उठाएं। पुस्तकों की कीमत देखते हुए यह संशय या संकोच मन में न पालें कि कीमत ज्यादा है। अगर आर्थिक विकास का ज्ञान चंद रुपयों में मिल जाए और आपकी और आपके आनेवाली पीढ़ी की जिंदगियां संवर जाए तो उस ज्ञान को प्राप्त करने की कीमत देने में कंजूसी करना मूर्खता होगी। मैं भी तो पहले पुस्तकें खरीद कर उन्हें आगे बेच रहा हूँ और यह रिस्क उठा रहा हूँ। मैंने अपना समय पहले इंग्लिश सीखने में दिया और फिर पुस्तकें पढ़ने और व्यवसाय में। मुझे तो सफलता ही मिली है। अब मेरा यह ज्ञान और डॉ अम्बेडकर का सपना मैं सब तक ले जाना चाहताा हूँ। आप यह ध्यान रखें कि मैं हिन्दीभाषी क्षेत्र में वह पहला व्यक्ति हूँ जो यह कदम उठा रहा है कि आप तक यह शिक्षा पहुंचा रहा है। यह पुस्तकें वैसे तो हिंदी भाषा में वर्षों से प्रकाशित हो चुकी है परन्तु लोगों को इनकी और इनके भीतर लिखे ज्ञान की जानकारी मैं इस प्रकार पहली बार दे रहा हूँ। आप अधिक-से-अधिक इन्हें खरीदें और स्वयं पढ़ने के साथ-साथ मित्रों को भी इन्हें भेंट करें। इससे एक तो आप और आपके साथ के लोग इस शिक्षा से विकसित होंगे और साथ-ही-साथ मेरा व्यापार बढ़ने से मैं और भी ऐसे लोगों तक इस शिक्षा को पहुंचाउंगा जिन तक इंटरनेट नहीं पहुँच पाता या जो पुस्तकें नहीं खरीद पाते। पर वह सब तब ही हो पाएगा जब आप एक बार यह पुस्तकें खरीदेंगे। पुस्तकें मुझ से ही से खरीदे क्योंकि मैं ही इस मुहीम को शुरू कर रहा हूँ और इस मुहीम के आर्थिक लाभ का सही हकदार हूँ। दूसरे विक्रेताओं के लिए यह पुस्तकें मात्र हैं परन्तु मेरी लिए लोगों की जिंदगियां संवारने का माध्यम और मेरे जीवन का एक ध्येय। तो आज ही पुस्तकें सीधे हमारे वेबसाईट पर जा कर आर्डर करें। पेमेंट आप ऑनलाईन बैंकिंग, डेबिट कार्ड अथवा क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं। अथवा बैंक में रूपये जमा करवाने के लिए इस नंबर पर फोन करे - 8527533051. हम पुस्तकें भारत में कहीं भी डाक द्वारा भेज देंगे।

तो इस मुहीम का हिस्सा बनिए और डॉ अम्बेडकर की सोच को आगे बढ़ाने और भारत को एक स्वावलम्बी और स्वतन्त्र भारत बनाने के लिए ज्यादा-से-ज्यादा यह पुस्तकें लोगों को भेंट करें।  आज के दौर में आर्थिक निर्भरता गुलामी से भी बदतर है।  आर्थिक स्वतंत्रता केवल और केवल व्यवसाय और निवेश देता है। एक व्यवसायी बनाना कोई मुश्किल नहीं है। भारत में ही सर पर टोकरा रख कर सामान बेचने वाले या पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले बड़े-बड़े व्यवसायी और निवेशक बन गए है। जरुरी नहीं है कि आपके पास कोई पैतृक खजाना हो। अमरीका में सड़क पर सब्जी बेचनेवाला आज अमरीका के सबसे बड़े खाने के स्टोर्स का मालिक है। तो अब आप ज्यादा इन्तजार नहीं करिए और तुरंत इन पुस्तकों को खरीद कर पढ़ डालिए।
व्यवसाय एवं निवेश सीखने वाली पुस्तकें आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके आर्डर करें अथवा फोन करें म. 8527533051. (Rs 2000, 7 Books)

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