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भारत में आज़ादी किसकी?

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भारत में आज़ादी किसकी?

Post  nikhil_sablania on Thu Oct 23, 2014 2:48 pm

भारत का अमानुष नरभक्षी वर्ग, जो खुद को ऊंची जाती का मानता है, नस्लवाद से लड़ने वाले नेन्सल मंडेला को तो बहुत ऊंचा स्थान देता है पर अपने ही देश में जातिवाद और नस्लवाद से लड़नेवाले डॉ भीमराव अम्बेडकर से उन्हें ख़ास खुजली है। यही दोगुलापन भारत को ले डूबा है। इस दोगुलेपन की वजह से ही भारत में समानता स्थापित करने का लक्षय आज़ादी के अढ़सठ सालों बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। समानता स्थापित न कर पाने की वजह से ही एक तरफ जहाँ बहिष्कृत समाज और भी पिछड़ गया है वहीं अमानुष वर्ग से भी एक बहिष्कृत समाज ने जन्म ले लिया है जो आर्थिक रूप से पिछड़ा है। एक तरफ तो इस अमानुष वर्ग की बड़ी मछलियां भारत के संसाधनों, बाज़ारों, राजनीती, प्रशासन और रक्षा विभागों पर अपना राज जमाए बैठी है वहीं जिनको यह नीची जाती या आदिवासी का कह कर दबाता है, भारत का वह मेहनतकश वर्ग जो भारत को बनाता है उसे आर्थिक विकास में भागीदारी के नाम पर यह अमानुष वर्ग ठेंगा दिखा देता है। 1947 में आजादी किसके लिए आई? दिल्ली में ही एक तरफ यह अमानुष वर्ग जहाँ काम जनसंख्या के होते हुए भी अत्याधिक उन्नति की जगहों पर जमे बैठा है वहीं वह वर्ग जिससे यह छुआछूत करता आया है अपनी अधिक जनसंख्या के होने पर भी तंग बस्तियों और अल्प साधनों में ही जकड़ कर रह गया है। यही हाल समस्त भारत का है। यह एक बड़ा प्रश्न है कांग्रेस और हिंदुत्व के ठेकेदारों से। एक तरफ कांग्रेस जहाँ सालों तक बेवकूफ बनाती रही वहीं हिंदुत्व के ठेकेदार समानता के सिद्धांत पर कोई काम नहीं कर रहे हैं। यदि यही हाल रहा तो भारत में सामाजिक फूट और जातीय संघर्ष सदैव के लिए बने रहेंगे और भारत में एक तरफ जहाँ अत्याधिक अमीरी जन्म लेगी जिसकी छाया में अमानुष वर्ग का मध्यम वर्ग पलेगा वहीं दूसरी तरफ अछूत और अविकसित बना कर रखा गया वर्ग तिल-तिल कर अपनी ज़िन्दगी कटेगा। आज़ादी किसकी ? क्या सरकारी स्कूल की घटिया शिक्षा वाले आज़ाद हैं ? क्या तंग बस्तियों में जीवन बसर करनेवाले आज़ाद हैं ? क्या घटिया सरकारी अस्पतालों में ज़िन्दगी तोड़नेवाले आज़ाद हैं ? क्या पीढ़ी-दर-पीढ़ी मज़दूरी करनेवाले आज़ाद हैं ? यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनको हर उस भारतीय को सोचना चाहिए जो समानता का पक्षधर है।

- निखिल सबलानिया

भारत को एक समानतवाला देश बनाने के लिए यह जरुरी है कि समानता के बीज प्रत्येक भारतीय के मस्तिष्क में बचपन से ही समानता के बीज बो दिए जाएं। इसके लिए डॉ भीमराव अम्बेडकर की लेखनी और उनके अम्बेडकरवादी आंदोलन से जुड़े लेखकों की पुस्तकें बहुत सहायक सिद्ध हो सकती है। अम्बेडकरवादी आंदोलन पर पुस्तकें इस वेबसाईट से प्राप्त करें www.cfmedia.in

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