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डॉ अम्बेडकर के शब्दों से वंचित समाज

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डॉ अम्बेडकर के शब्दों से वंचित समाज

Post  nikhil_sablania on Sat Oct 25, 2014 2:57 pm

बौद्ध ग्रंथों में आता है कि जब भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण का समय नज़दीक आ गया तो उनके शिष्यों ने उनसे पूछा कि भगवान आपके जाने के बाद क्या आप नहीं रहेंगे? तब भगवान ने कहा कि मेरे शब्दों को ही तुम मेरी उपस्थिति मान लेना। भगवान बुद्ध के देह त्याग के पश्चात प्रथम बौद्ध समीति बैठी जिसमें उनके प्रधान शिष्य महाकाशयप की अध्यक्षता में भगवान बुद्ध के धम्म उपदेशों और उनके जीवन के वृतांतों को लेखनीबद्ध किया गया। विवरण उनके भतीजे और शिष्य भंते आनंद द्वारा बताए गए और भंते महाकाश्यप ने वह लिखे। इस प्रकार भगवान बुद्ध के धम्मोपदेश जीवित रहे और बाद में उनका विश्व की कई भाषाओँ में अनुवाद हुआ जिससे कि समस्त विश्व भगवान बुद्ध के धम्म उपदेशों से प्रकाशमान हुआ।

ऐसे ही एक महापुरुष, एक बोधिसत्व (डॉ अम्बेडकर को बोधिसत्व महामहीम दलाई लामा ने 1956 में कहा था) भारत की धरती पर 1891 में जन्में जिनका नाम पड़ा भीम राव अम्बेवाड़ीकर। एक अछूत समाज में जन्म लेने के कारण उन्हें स्कूल में पढ़ने नहीं दिया जाता था, तो उनके ब्राह्मण गुरु ने उनको अपना नाम आंबेडकर दे कर ब्राह्मण ग्रंथों के विरुद्ध जा कर एक अछूत को पढ़ने का अवसर दिया। वह होनहार छात्र जब कालेज तक पहुंचा तो आगे शिक्षा करने के लिए उसे छत्रपति शिवजी के वंशज छत्रपति शाहूजी महाराज ने पढ़ने विदेश भेजा। शिवजी महाराज भी ब्राह्मणों द्वारा शूद्र माने जाते थे सो उनके वंशजों के साथ भी ब्राह्मण अच्छा व्यहवहार नहीं करते थे। सो शाहू जी महाराज को यह जरुरत मालूम पड़ी कि अछूत और शूद्र समाज को शिक्षित करना चाहिए और इसके लिए उन्होंने सबसे पहले इस समाज के लिए आरक्षण की व्यवस्था लागू की।

विदेश में दस सालों तक पढ़ कर भीम राव अम्बेडकर अपने ज्ञान को परिपक्त कर डॉ भीमराव अम्बेडकर बने। यह बात सोचने की है कि उन्होंने अपने समाज की स्वतंत्रता का रास्ता कोई बंदूक से नहीं बल्कि पुस्तकों के ज्ञान और कलम से खोजा। भारत लौट कर उनकी कलम की धार ने यहां के कट्टरपंथी रूढ़िवादी हिन्दुओं की मान्याताओं को झंकझोर कर रख दिया और उन्हें उनके किये पर इतना झुका दिया कि जो जो हिन्दू अछूतों और शूद्रों को पढ़ने भी नहीं देते थे और यहां तक कि अपने पास फटकने भी नहीं देते थे उन्हें एक अछूत से अपना कानून लिखवाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

परन्तु यह एक विडम्बना है कि डॉ अम्बेडकर का अछूत, आदिवासी और शूद्र समाज जिसे आज एस. सी. / एस. टी. / ओ. बी. सी. (SC/ST/OBC, दलित, आदिवासी, शूद्र) आदि नामों से जाना जाता है वह आज भी एक कमजोर और शूद्र समाज है।  इसका प्रमुख कारण क्या है? इसका प्रमुख कारण है कि जिस ज्ञान के भण्डार से डॉ अम्बेडकर ने इस समाज की दो हजार वर्षों की परतंत्रता की लड़ाई लड़ कर इस समाज को जीवन दिया और अपने उस ज्ञान को जो डॉ अम्बेडकर ने अपनी पुस्तकों, लेखों और भाषणों में लिखा उस ज्ञान से यह समाज वंचित रहा।  इसके कुछ प्रमुख कारण यह हैं : एक, पहले से अशिक्षित समाज में शिक्षा का स्तर इतना काम था कि उन्हें डॉ अम्बेडकर का लिखा समझ में नहीं आता था।  दूसरा, अब तक की सरकारों ने भी डॉ अम्बेडकर के साहित्य को प्रकाशित करने में आनाकानी की। यहां तक कि अम्बेडकरवादियों को कोर्ट में केस लड़ कर डॉ अम्बेडकर के साहित्य को प्रकाशित करवाना पड़ा। प्रकाशित होने के बाद भी सरकार ने प्रतिवर्ष इसकी प्रतियां नहीं छपी जिससे यह समाज तक नहीं पहुँच पाया। एक तरफ गांधी आदि कांग्रेस ने नेताओं के लेख जहाँ-तहाँ सरकार ने औने-पौने दामों पर उपलब्ध करवाए वहीं डॉ अम्बेडकर की महान लेखनी को दबाने का पूरा इंतजाम किया। तीन, शिक्षित हुआ डॉ अम्बेडकर का समाज भी बस अपने परिवार और नौकरी में लगा रहा और भूल गया कि उनके जीवन का उद्देश्य केवल आरक्षण से शिक्षा, नौकरियां, मंत्रिपद, माकन, पेट्रोल पम्प आदि पा कर अपना स्वार्थपूर्ति करना नहीं बल्कि डॉ अम्बेडकर के उद्देश्य को पूरा करना है।  गाँवों और दलित बस्तियों से बाहर जा कर उन्होंने कालेजों में शिक्षा और नौकरियां तो पा ली पर वह अपने भाई-बहनों को भूल गए। वह भूल गए डॉ अम्बेडकर की इस बात को कि तुम्हारा उद्धार करने कोई अवतार नहीं आएगा बल्कि तुम्हें अपना और अपने समाज का उद्धार खुद ही करना है। समाज की बागडोर अपने हाथों में लेने की बजाय और अपनी आनेवाली पीढ़ी को डॉ अम्बेडकर के विचार देने की बजाय वह अपनी पहचान छुपा कर, हिन्दू रीती-रिवाजों या ईसाई, सिख और मुस्लिम धर्मों में खुद को भुला कर, अपने बच्चों को भी डॉ अम्बेडकर से दूर करते चले गए। इसका परिणाम है कि जहां एक तरफ एक ही जाती के कुछ परिवार अत्याधिक समृद्ध है वहीं उसी जाती के अधिकांश्तर परिवार अत्यंत पिछड़े हुए हैं। चार, दलित, शूद्र और आदिवासी नेता भी केवल स्वार्थपूर्ति ही करते रहे। इन्होने डॉ अम्बेडकर के नाम और उनकी छवि का इस्तेमाल किया परन्तु कभी उनके विचारों को लोगों तक ले जाना अपना उद्देश्य नहीं बनाया। बौद्ध धम्म का प्रचार भी यह सही से नहीं कर पाए। यह कुछ मुख्य कारण हैं जिनकी वजह से समाज डॉ अम्बेडकर के ज्ञान से वंचित रहा और वह गति नहीं प्राप्त कर पाया जो डॉ अम्बेडकर के जीवनकाल में उस समाज ने पकड़ी थी जो उनके लेखों और उनकी पुस्तकों को बड़े चाव से पढता था और उनके भाषणों को सुनता था। आज बहुत से नेता जो इस समाज के नाम पर मंच पर बैठ जहाँ-तहाँ कोई बात कहते हैं तो उनकी बातों से ही प्रतीत होता है कि उन्होंने भी डॉ अम्बेडकर के कथनों का अध्यन्न नहीं किया। यही कारण है कि वह समाज को नई दिशा नहीं दे पाते और उनका  मार्गदर्शन नहीं कर पाते और उस कारण समाज भी उनसे कतराने लगता है।

भगवान बुद्ध के बताए अष्टांगिक मार्ग यदि यह समाज अपने पर लागू कर ले तो अपना उद्धार कर सकता है। उन्होंने इन्हें इस प्रकार बताया हैं : 1. ठीक द्रिष्टि, 2. ठीक संकल्प, 3. ठीक वचन, 4. ठीक कर्म, 5. ठीक जीविका, 6. ठीक प्रयत्न्न, 7. ठीक समृति और 8. ठीक समाधी। इन मार्गों को पहले से आखरी तक क्रमबद्ध सम्बन्ध के रूप में ही देखना चाहिए। जब तक पहले मार्ग, ठीक द्रिष्टि, को प्राप्त नहीं किया जाता शेष प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं। ठीक द्रिष्टि का तात्पर्य है ठीक दर्शन। ठीक दर्शन तब ही हो सकता है जब ठीक अध्यन्न किया हो। जब तक ठीक अध्यन्न ही नहीं होगा तब तक कैसे ठीक द्रिष्टि पैदा होगी, जिससे कि ठीक संकल्प अर्थात ठीक (सही) निश्चय लेने की शक्ति आएगी? आज ठीक द्रिष्टि नहीं होने की वजह से इस शोषित समाज में ठीक निर्णय लेने की क्षमता ही नहीं है, तो आगे के मार्गों पर यह समाज कैसे जा सकता है? इसका परिणाम होगा कि इसे न तो ठीक वचन आएंगे (जब इन्हें सही बात बोलना ही नहीं आएगा तो यह कैसे आगे बढ़ेंगे?), इस वजह से ही इन्हें ठीक कर्म करने नहीं आते (यह वह काम नहीं कर पाते जिससे इनका भला हो), यही वजह है कि इनकी ठीक जीविका नहीं बन पाती (जिसका परिणाम है कि यह आज भी निम्नत्तम वेतनभोगी श्रमिक मजदूर बने हैं), यही कारण है कि इनके प्रयत्न्न ठीक नहीं होते (ठीक जीविका न होने के कारण पैसे के अभाव में यह बड़े लक्षय वाले प्रयत्न्न नहीं कर पाते), यही कारण है कि इनकी ठीक स्मृति नहीं बन पाती (यही कारण है कि इनकी सामाजिक यादों में कोई ऐसी यादें (स्मृतियाँ) नहीं हैं जिन पर यह समाज को आगे ले जा सकें। इनके पास न अपना मौखिक इतिहास है और न लिखित। डॉ अम्बेडकर के विचार से भी यह अनजान हैं), यही कारण है कि यह सही समाधी (सही ध्यान, सही सामाजिक चेतना) को प्राप्त नहीं कर पाते।

तो यदि इस समाज को खुद को उठाना है तो सबसे पहले अपनी द्रिष्टि, अपना दर्शन ठीक (सही) करना होगा। और वह दर्शन जो इन्हें ठीक (सही) द्रिष्टि देता है वह है डॉ अम्बेडकर की लेखनी और उनका जीवन। इन्हें डॉ अम्बेडकर के कथनों  और उनके जीवन से अवगत होना पड़ेगा। यदि यह ऐसा नहीं करते तो इनकी ठीक द्रिष्टि नहीं पैदा हो पाएगी जिससे यह ठीक सामाजिक चेतना को प्राप्त कर पाए। ठीक सामाजिक चेतना न होने के कारण यह कोई बड़े पारिवारिक या व्यक्तिगत लक्ष्यों को भी नहीं प्राप्त कर सकते और यदि कुछ प्राप्त कर भी लेंगे तो उन्हें सुरक्षित और कायम रखना इन्हे नहीं आएगा। सामाजिक चेतना के अभाव  का ही दुष्परिणाम है कि आज भी अधिकांश्तर समाज के लोग निम्नन स्तर पर हैं और उन पर अत्याचार लगातार बढ़ ही रहे हैं। - निखिल सबलानिया

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