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कला और साहित्य से वंचित भारतीय युवा

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कला और साहित्य से वंचित भारतीय युवा

Post  nikhil_sablania on Sat Oct 25, 2014 3:38 pm

आज अधिकांश्तर युवा और युवतियां अपने जीवन का ध्येय नौकरी पाना मात्र बना लेते हैं। वह किसी पूंजीपति या पूंजीपतियों की सरकारों के लिए किसी मशीन की भांति अपना जीवन झोंक देते हैं। न अपनेआप को समय दे पाते हैं न अपने मित्रों और परिवार को। कला और साहित्य से दूर वह पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों द्वारा तैयार किए गए ऐसे मरुस्थल में पहुँच जाते है जहां उन्हें जल की खोज होती है और पानी की चंद बूंदें उन्हें इस प्रकार दी जाती हैं कि वह बस मरे नहीं।

चार साल पहले मैंने निश्चय किया कि मैं कानून की पढ़ाई पढूंगा। अपने फिल्म निर्माण, लेखन और निर्देशन के कार्य से कुछ सालों के लिए अवकाश ले कर मैंने कानून की पढ़ाई की। चार सालों बाद मैंने फिर से अपने फिल्म के काम शुरू किए और कुछ बातें सोच कर मैं बहुत चिंतित हुआ।

चार सालों बाद जब मैंने फ़िल्में देखी, संगीत सुना और लेखन कार्य शुरू किया तो मैंने पाया कि फिल्मों से जुड़ी कला जैसे लेखन, संकलन, छायांकन, ध्वनि निर्माण, संगीत, चित्रकला, अभिनय, नृत्य, रूप सज्जा (मेकप), इन्टियर डिजाइनिंग आदि जो भी कलाएं है उनका जीवन में कितना महत्व है। अपनी फिल्म लेखन और निर्देशन की पढ़ाई के दौरान मैंने कितने ही विश्व क्लासिक उपन्यास पढ़े, विश्व के अलग-अलग देशों की फ़िल्में देखी और उनके माध्यम से वहां की कला, साहित्य और संस्कृति का अध्यन्न किया। यह सब देख कर मुझे यह प्रतीत हुआ कि कला और साहित्य का मानव की संस्कृति और अस्तित्व में वही विशेष स्थान है जो धर्म, राजनीती और व्यवसाय का है।

परन्तु मैनें पाया कि आज की युवा पीढ़ी जो स्कूल और कॉलेजों में पढ़ रही है और जो नौकरी में लगी है वह कला और साहित्य से वंचित है। आज यदि कोई कला और साहित्य की तरफ रुख करता है तो केवल रोजी-रोटी के लिए न कि खुद को खोजने के लिए। कला और साहित्य में मानव के खुद को खोजने के प्रयास से ही उसे अपने अस्तित्व का बोद्ध होता है जिससे वह एक पूर्ण बुद्धिजीवी बनता है।

पर अफ़सोस कि आज अधिकांश्तर युवा और युवतियां अपने जीवन का ध्येय नौकरी पाना मात्र बना लेते हैं। वह किसी पूंजीपति या पूंजीपतियों की सरकारों के लिए किसी मशीन की भांति अपना जीवन झोंक देते हैं। न अपनेआप को समय दे पाते हैं न अपने मित्रों और परिवार को। कला और साहित्य से दूर वह पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों द्वारा तैयार किए गए ऐसे मरुस्थल में पहुँच जाते है जहां उन्हें जल की खोज होती है और पानी की चंद बूंदें उन्हें इस प्रकार दी जाती हैं कि वह बस मरे नहीं। अंततः एक मानव जीवन वर्षों तक किसी बैल या गधे की तरह काम कर-कर के मर जाता है। कला और सहित्य जो उसे उसके जीवन का एहसास करा देते, जो उसके जीवन में कुछ खुशियाँ भर देते, जो मानव संस्कृति और आनेवाली पीढ़ी को अमूल्य धरोहर दे देते, उनसे वह वंचित रहता है।

आज भारत के युवक युवतियों का यह हाल है कि वह कला और साहित्य से और दूर होते जा रहे हैं। अधिकतर पूंजीपति और राजनेता तो, डरपोक, मूढ़ और स्वार्थी होते हैं। इनमें मरुभूमि में पेड़ उगाने का साहस नहीं है और न ही इनमें पंख लगा कर उड़ने की चाहत। इनकी बनाई दुनिया किसी बंजर ज़मीन की तरह है जहां कोई पौधा सही से नहीं खिल सकता। परन्तु कला और साहित्य मनुष्य के जीवन को वह देते हैं जिससे उसका जीवन किसी हरे-भरे बाग़ की तरह खिल जाता है। भारत के अधिकांश्तर लोग कला और साहित्य से दूर रह कर खूब मेहनत करते हैं पर फिर भी हम ठीक से न खा पाते हैं न कोई बहुत ही सुख और सम्पदा प्राप्त कर पाते हैं। अंततः हम एक महँगी दुनिया में सस्ते श्रमिक बन कर मर जाते हैं और अपने आनेवाली पीढ़ी को भी उसी रास्ते पर और उसी खाई में धकेल देते हैं जिसेसे हम खुद बाहर नहीं आ पाए।

सो मेरी अपने भारत के युवक और युवतियों से यह विनती है कि वह कला और साहित्य को अपने जीवन का हिस्सा बनाए। इसके लिए उन्हें परिवार को समझा-बुझा कर तैयार करना चाहिए। वह पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों की बनाई दुनिया में कहीं खोने नहीं चाहिए। उन्हें अपने जीवन में कला और साहित्य से जुड़े बड़े लक्षय बनाने चाहिए। उन्हें कल्पना के पंख लगा कर उड़ना चाहिए। याद रखें कि आज जितने भी आविष्कार हुए हैं वह कोई पूंजीपति, वैज्ञानिकों या राजनेताओं और नौकरीपेशा लोगों ने नहीं किए। वह कल्पनाओं की उड़ान भरने वाले लोगों ने किए है। हर वैज्ञानिक न आविष्कार करता है और न कल्पना कर सकता है। आज हवाई जहाज उड़ाने वाले पायलट और उसे बनानेवाले इंजिनियर तो सब बनाना चाहते हैं पर पंख लगा कर उड़ने की कल्पना करनेवाला कोई नहीं बनाना चाहता। वह पंख लगा कर कूद कर जान देनेवाले लोग ही थे जिन्होंने हवाई जहाज की कल्पना को जीवित रखा। वह मनाव जीवन को शांतिमय और कल्याणकारी बनाने वाली कल्पना ही थी जिसे लेकर सिद्धार्थ गौतम राज भवन को छोड़ जंगलों में गए और अपने धम्म को खोज बुद्ध बने, वह डॉ अम्बेडकर की कल्पना ही थी जिसने दो हज़ार सालों से चल रही छुआछूत की प्रथा को ख़त्म करके भारत के विभाजित समाज को एक करने का अध्याय शुरू किया, वह किसी की कल्पना ही थी कि एक दिन कोई एवरेस्ट पर चढ़ गया।

कल्पनाओं को कला और साहित्य एक ऐसी दिशा देते हैं जिससे मनुष्य अपने भावनात्मक पहलू से परिचित होता है। इससे उसे बहुत ख़ुशी और सुख प्राप्त होता है। कला और साहित्य ही मानव इतिहास को ज़िंदा रखते हैं और उसकी संस्कृति की पहचान होते हैं। कला और साहित्य पर ही संस्कृति खड़ी होती है और राष्ट्र का निर्माण होता है। जैसी कला और साहित्य वैसी ही संस्कृति, वैसे ही लोग, वैसा ही इतिहास और वैसा ही राष्ट्र। यूरोप और कई विकसित देशों में युवक और युवतियां बहुत मात्रा में कला और साहित्य से जुड़े विषयों को अपने जीवन का हिस्सा बनाते है और यही भी एक कारण है कि वह कई बातों में हमसे अधिक बुद्धिजीवी और काल्पनिक होते हैं।

सो, मैं तो अंततः यही चाहूंगा कि ज्यादा-से-ज्यादा युवा इस लेख को पढ़े और कला और साहित्य का महत्व समझते हुए उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाए। - निखिल सबलानिया

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