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हमसे पूछा तो होता

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हमसे पूछा तो होता

Post  Admin on Sun Mar 20, 2011 2:45 am

हमसे पूछा तो होता

[size=18]देश का बजट तो पेश हुआ। सबसे पूछा गया। किसान, बुनकर, मध्यम वर्ग, व्यवसायी, मजदूर आदि सभी को सम्पर्क किया गया लेकिन 25 प्रतिशत देश की आबादी, जो दलितों एवं आदिवासियों की है, से शायद देश की एक भी मीडिया ने नहीं पूछा कि वे इसके बारे में क्या महसूस करते है? 12,57,729 करोड़ रूपये के कुल व्यय का बजट में प्रस्ताव किया गया है।

बारह लाख सत्तावन हजार सात सौ उनतीस करोड़ रूपये के बजट में योजनागत् राशि 4,41,547 करोड़ रूपये है। पहले गैर योजनागत राशि कम हुआ करती थी लेकिन समयान्तराल यह बढ़ती जा रही है, जैसे कि इस बजट में गैर योजनागत राशि - 8,16,182 करोड़ रूपये है। योजनागत बजट में 39,370 करोड़ रूपये दलितों एवं आदिवासियों के विकास के लिए है। इसके अतिरिक्त दलितों को एक प्रतिशत एवं आदिवासियों को एक प्रतिशत की राशि उनके विकास के लिए दी गयी है। कुल मिलाकर 11 प्रतिशत योजनागत बजट की राशि इनके विकास के लिए रखी गयी है। स्पेशल कांपोनेंट प्लान सन् 1979 में लाया गया था और उसका मकसद यह था कि दलितों की आबादी के हिसाब से बजट का पैसा उनके विकास में खर्च किया जाए। इसी तरह से ट्राइबल सब-प्लान की व्यवस्था की गयी और उसमें भी आबादी के अनुपात में धनराशि को खर्च करना होगा।

उसके बाद से जितने भी बजट बनाए गए हैं, किसी में भी स्पेशल कांपोनेंट प्लान एवं ट्राइबल सब-प्लान में जितना प्रतिशत राशि आबंटित करनी थी नहीं हुई। 25 जून, 2005 को नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल में यह तय किया गया था कि 10 वर्ष के भीतर विभिन्न वर्गों में जो आर्थिक फासले हैं, उनको खत्म कर दिया जाएगा। इस बजट को देखने से भी नहीं लगता है कि दूर-दूर तक नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल की भावना कभी पूरी हो सकती है। 5 वर्ष का समय बीत गया है और आने वाले 5 वर्ष में कोई जादू नहीं होने वाला है। सरकार के फैसले, नीतियां एवं योजनाएं इसी तरह से न लागू होने की स्थिति में लगातार जनता का विश्वास उठता जा रहा है। मंत्री एवं अधिकारी आज कुछ भी विकास एवं उत्थान के लिए कहें या बोलें या सरकार कानून बनाए, जनता को बहुत कम यकीन होता है कि वह लागू भी हो सकेगा।

बीते जमाने में दलित एवं आदिवासी बजट के आकड़े के खेल को नहीं समझ पाते थे लेकिन अब कुछ समझने लगे हैं। जैसे ही बजट पढ़ा गया, जगह-जगह पर चर्चा होने लगी कि इसमें उनके लिए क्या है? कुछ शिक्षित लोगों ने कहना शुरू कर दिया है कि यदि बजट 12,57,729 करोड़ रूपये का है तो सीधे-सीधे इसका 25 प्रतिशत, जो दोनो की आबादी है, 3,14,432.25 करोड़ रूपये की धनराशि का प्रावधान इनके विकास के लिए करना चाहिए था। बजट के पहले नई दिल्ली के अम्बेडकर भवन एवं नागपुर आदि स्थानों पर दलित-आदिवासी बुद्धिजीवियों की बैठकें हुई, जिनमें ये सारी बातें उठायी गयी। योजना आयोग एवं वित्त मंत्री को ज्ञापन एवं पत्र भी दिए गए परन्तु बजट में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ। भले ही बजट में इनके उत्थान के लिए कम पैसे दिए जाते हों, लेकिन कुछ हद तक इनका उत्थान हो सकता है यदि बजट तैयार करते वक्त इन वर्गों के प्रतिनिधियों से वित्त मंत्री एवं योजना आयोग मिले और उनके सुझावों को शामिल करे। ट्रेड यूनियन, मजदूर संगठन, उद्योगपतियों के संगठन एवं किसानों आदि को वित्त मंत्री दावत देकर मिलते हैं तो ऐसा दलितों व आदिवासियों के लिए क्यों नहीं किया जा सकता? यदि ऐसा किया जाए तो सरकार को ही फायदा होगा, क्योंकि वे जानते हैं कि किस तरह से इस पैसे से बेहतर विकास का मानचित्र तैयार किया जा सकता है।

पहले मैंने सुझाव दिया था कि केन्द्र, राज्य एवं जनपद स्तर पर एक समिति या संगठन दलित-आदिवासी बुद्धिजीवी की बने, जो न केवल योजना बनाने में सहयोग करे बल्कि उसे लागू करने तक में उसकी देखरेख हो। इन समितियों में कुछ उन लोगों को भी समायोजित किया जा सकता है जो आर्थिक मामलों के जानकार हैं और उनका इन वर्गों के प्रति समर्पण है। भारत सरकार के सेवानिवृत्त सचिव श्री पी.एस. कृष्णनन्, जो तथाकथित सवर्ण समाज से हैं, का नाम सुप्रसिद्ध है। इनके अतिरिक्त और भी लोग समाज में हैं, जिनका सहयोग लेकर इसी पैसे में बेहतर विकास किया जा सकता है। सभी जानते हैं कि कॉमन वेल्थ गेम्स में दिल्ली सरकार ने 744 करोड़ रूपये स्पेशल कांपोंनेंट प्लान का खर्च कर दिया था। बाद में जब पता लगा तो गृहमंत्री चिदंबरम को संसद में बयान देना पड़ा कि इनका पैसा वापिस कर दिया जाएगा और उन्हीं के उत्थान में इसे खर्च किया जाएगा।

सरकार ने अगर इनसे नहीं पूछा तो मीडिया को हाल-चाल लेना ही चाहिए था। बजट के पूरे दिन और उसके दूसरे दिन भी देश के दलित-आदिवासी टेलीविजन देखते रहे और अखबार भी पढ़े कि मीडिया के लोग क्या उनके बारे में भी बजट से संबंधित सवाल-जवाब करेगें। सभी चैनलों ने शाम को विशेष वार्ता आयोजित की। राजनैतिक लोगों को तो आमंत्रित किया ही। इनके अतिरिक्त अन्य वर्गों जैसे - मध्यम वर्ग, व्यापार, ट्रेड यूनियन, पठन-पाठन आदि को भी वार्तालाप के लिए आमंत्रित किया गया। इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोग क्या भूल गए कि इस देश में 25 प्रतिशत दलित-आदिवासी भी रहते हैं? पिछड़े वर्ग से भी शायद नहीं जाना-समझा गया कि वे बजट के बारे में क्या समझते हैं? जब दलितों एवं आदिवासियों की महिलाओं के साथ बलात्कार आदि होता है तो चैनलों के लिए ब्रेकिंग न्यूज होती है और जब उनके उत्थान से संबंधित बात हो तो उनका अता-पता ही न हो। दुनिया में इतना ज्यादा भेदभाव शायद कहीं देखने को नहीं मिलेगा। यदि यही मानसिकता रही तो राजनीति में जातिवाद बढ़ेगा। कुछ लोग भले ही अपनी मानसिकता को लोगों पर थोपेें, उससे सच्चाई नहीं छुपने वाली है। बिहार विधान सभा के चुनाव के नतीजे जब आने लगे तो विश्लेषक अति उत्साहित होकर कहने लगे कि अब बिहार की राजनीति से जातिवाद की विदायी हो रही है। या तो वे बहुत ही भोले हैं अथवा एक निश्चित सोच के तहत ऐसा किए जबकि सच्चाई कुछ और ही है। जद(यू) एवं भाजपा मोर्चे के विकल्प में जब राजद को लोगों ने देखा, वहां की जनता असुरक्षा की भावना के तहत नीतीश कुमार को जिताया। जब लालू यादव के समय की कानून-व्यवस्था की याद जनता को आई तो उन्हें लगा कि फिर से वे असुरक्षा में पड़ जाएंगें। इस तरह से लगभग 40 प्रतिशत वोट को प्रभावित करने का काम कानून-व्यवस्था की वजह से हुआ। नीतीश कुमार ने महादलित एवं अति दलित को आरक्षण देकर इनका वोट पक्का कर लिया। पूर्वाग्रहित विश्लेषकों ने इस बात को नहीं कहा। विकास की वजह से ज्यादा से ज्यादा 30 से 35 प्रतिशत लोगों ने वोट दिया होगा। मान लिया जाए कि नीतीश कुमार कोई ऐसा कदम उठा दें जो वहां के सवर्णों के खिलाफ चला जाए तो अगली बार जब विधान सभा का चुनाव होगा तो जो स्थिति आज विपक्ष की हुई है, वह जद(यू) और भाजपा की भी हो सकती है। फिर ये विश्लेषक या विद्वान बिहार के बारे में क्या कहेगें?

वित्त मंत्री एवं योजना आयोग से शिकायत तो है ही लेकिन मीडिया के रुख से देश का दलित-आदिवासी बहुत आहत हैं कि बजट के संबंध में उसका हाल पूछा ही नहीं गया। भले ही तथाकथित देश के बुद्धिजीवियों की नजर में यह सवाल बहुत संदर्भित न हो लेकिन हम जानते हैं कि इसका कितना दूरगामी परिणाम होगा, जिसकी कीमत पूरा देश चुकाएगा। 25 प्रतिशत आबादी को अलग-थलग रखकर स्वयं को नुकसान करना है। जब देश की इतनी बड़ी आबादी को इस मीडिया में विश्वास नहीं होगा तो देश कमजोर होगा। यही कारण है कि जब मायावती जैसे नेता गलत कृत्य भी करें और मीडिया उसको लिखे तो दलित गंभीरता से नहीं लेता क्योंकि उसकी भी मानसिकता बन गयी है कि मीडिया उसकी कितनी है?



- डॉ0 उदित राज

राष्ट्रीय अध्यक्ष, इंडियन जस्टिस पार्टी एवं

रा. चेयरमैन, अनुसूचित जाति/जन जाति संगठनों का अखिल भारतीय परिसंघ

टी-22, अतुल ग्रोव रोड, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली-110001

फोनः 23354841.42, टेलीफैक्स: 23354843

E-mail : dr.uditraj@gmail.com

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